Sunday, 26 October 2014




बच्चों को टीवी गेम, कार्टून से रखें दूर


इलाहाबाद
अगर आपके बच्चे टीवी गेम और कार्टून शो ज्यादा देख रहे हैं, आप उनको वैज्ञानिक बनाने का सपना देख रहे हैं तो संभल जाइए। यह चेतावनी नोबेल प्राइज विनर साइंटिस्टों की है। इनकी नोबेल टिप्स है कि बच्चों में साइंटिफिक सोच पैदा करना है तो उनको टीवी गेम व कार्टून शो से दूर रखें। यह सलाह है फ्रांस के रहने वाले फिजिक्स में नोबेल प्राइज पाने वाले प्रफेसर क्लाउड कोहीन तनोजी का।

गोल्डन टाइम न होने दें बर्बाद
नोबेल साइंटिस्ट तानोजी का कहना है कि आज के समय में बच्चे शुरू से ही टीवी प्रोग्राम व कार्टून के दीवाने होकर अपना गोल्डन समय बर्बाद कर देते हैं। उनके सोचने व समझने की शक्ति दूसरे दिशा में डायवर्ट हो जाने से वह दुनिया की नई तकनीकों से अवगत नहीं हो पाते हैं। ट्रिपल आईटी में चल रहे विज्ञान समागम में आए छात्र-छात्राओं को उन्होंने सलाह दी कि वह अपने आसपास के बच्चों को इस टीवी गेम व कार्टून के लत से छुटकारा दिलाने की दिशा में काम करें। प्रफेसर तानोजी ने कहा कि स्वयं की उन्नति कठिन मेहनत से मिलती है, इसलिए डिवेलप थिकिंग की तरफ सबको जाना चाहिए। नोबेल साइंटिस्ट ने पैरेंट्स को भी सलाह दी कि बच्चों की जिस फील्ड में रुचि हो उसको उसी ही फील्ड में भेजे। बच्चों के रटकर याद करने की आदत को घातक बताते हुए कहा यह लाइफ टाइम नहीं चलता इसलिए बच्चों को समझाएं रटने से बेहतर समझकर पढ़ना है।

दो हजार से ज्यादा स्टूडेंट्स ने हिस्सा लिया
मेडिसिन की फील्ड में फिजियोलॉजी पर नए रिसर्च करने पर नोबेल प्राइज पाए अमेरिका के प्रफेसर सर रिचर्ड जे राबर्ट ने अपने सफलता की कहानी का श्रेय पिता को देते हुए कहा कि वह मुझे हमेशा सफलता के लिए उत्साहित करते थे। पिता मेरे मोटर मैकेनिक थे, माता हाउसवाइफ थी। रिजनींग व मैथ को आसान समझकर आसानी से सीखा। 15 साल की उम्र में मैने ओ लेबल मैथमैटिक्स, फिजिक्स व कैमेस्ट्री में विशेष मेहनत करके अच्छा मार्क्स हासिल किया। इलालाबाद में हो रहे दुनिया के छठे विज्ञान समागम को उन्हें इंडिया के बच्चों के लिए विशेष मौका बताया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम से बच्चों में साइंस के प्रति जागरूकता पैदा होगी। प्रफेसर राबर्ट ने कहा कि विज्ञान का संसार आज भी अधूरा है। मेरा मानना है दुनिया के सारे वैज्ञानिक अपने-अपने रिसर्च को फॉलो कर रहे हैं, फिर भी एक रिसर्च के बाद दूसरा रिसर्च पहले रिसर्च में से पैदा हो जाता है। अगर आप यह कहें रिसर्च जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है तो गलत नहीं है। सोमवार को विज्ञान समागम में देश-दुनिया के दो हजार से ज्यादा छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।
----------------------

टून का जुनून: बच्चे क्रेजी, पैरंट्स परेशान



कार्टून कैरक्टर्स का जुनून ही कुछ ऐसा है कि वह बच्चों के सिर चढ़कर बोलता है, लेकिन लॉन्ग टर्म में बच्चों पर इसके बुरे प्रभाव भी देखे गए हैं। कार्टून कैरक्टर्स के बच्चों पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन कर रही हैं गुंजन शर्मा :

रोजाना की तरह उस दोपहर भी धैर्य ने स्कूल से घर आकर अपना बैग बिस्तर पर फेंका और टीवी देखने की जिद करने लगा। टीवी पर अपना फेवरिट कार्टून सीरियल देखना था उसे। उस दिन घर पर मुंबई से उसके मामा आए हुए थे। दो-चार घंटे धैर्य के साथ बिताने के लिए मामा ने टीवी का रिमोट छिपा दिया था। कुछ देर बाद अचानक दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो दो पुलिसवाले खड़े थे। पूछने लगे कि समीर कौन हैं यहां? धैर्य के पापा ने पूछा क्या बात है, तो उनमें से एक पुलिसवाला बोला - आप यहां बच्चे को सताते हैं? उसका हरासमेंट करते हैं? धैर्य की मां सारा मामला समझ चुकी थी। पुलिसवालों को वापस भेजा। तुरंत धैर्य के पास गई और उससे बात की। धैर्य ने बताया कि आज मेरे फेवरिट कार्टून का स्पेशल शो आना था और मामा मुझे रिमोट नहीं दे रहे थे इसलिए मैंने पुलिसवाले अंकल को फोन कर दिया। मैंने उन्हें बताया कि इस घर में मेरा हरासमेंट होता है। यह किस्सा बताया सात साल के धैर्य की मम्मी नीतू ने। दरअसल, कुछ दिन पहले धैर्य ने किसी कार्टून प्रोग्राम में ऐसी हरकत करते हुए अपने फेवरिट कार्टून कैरक्टर को देखा था और उसी वाकये को उसने अपनी असली जिंदगी में दोहरा दिया।

बात सिर्फ धैर्य की ही नहीं है, धैर्य जैसे न जाने कितने बच्चे आजकल कार्टून प्रोग्राम के आदी हो चुके हैं। एकल परिवारों और सिंगल चाइल्ड का बढ़ता चलन, खेल के मैदानों की कमी, कामकाजी पैरंट्स का बच्चों को समय न दे पाना, ऐसे तमाम कारण हैं जो बच्चों को दिन भर टीवी से चिपके रहने को मजबूर करते हैं और नतीजा बच्चों के अंदर आने वाले व्यवहार संबंधी बदलावों के रूप में सामने आता है।
फैंटसी की दुनिया में जीते बच्चे
ज्यादा से ज्यादा समय कार्टून देखने में बिताने से बच्चों को कार्टून की वर्चुअल दुनिया रियल लगने लगती है। वे उस दुनिया को असली समझकर उसी में जीने लगते हैं। 4 साल के आर्यन की मम्मी रश्मि ने बताया कि उनका बेटा डोरेमोन को असली समझता है। उसे लगता है कि जब भी वह होमवर्क नहीं करेगा तो डोरेमोन आएगा और उसे एक ऐसा गैजेट देगा, जिससे उसका सारा होमवर्क खुद-ब-खुद हो जाएगा। अपनी हर परेशानी का हल वह डोरेमोन में ढूंढता लगा है।

वाकई कई मामले ऐसे भी देखे गए हैं, जिनमें बच्चों के ऊपर उनका फेवरिट कार्टून इतना हावी हो जाता है कि वे उसकी नकल करना शुरू कर देते हैं। उसके जैसा मास्क लगाकर अकेले उस फैंटसी की दुनिया में जीना जो दरअसल है ही नहीं, बच्चों का शगल बन चुका है।

पहले कार्टून देखने के लिए और फिर अपने फेवरिट कार्टून कैरक्टर वाला बैग, ड्रेस, कॉपी आदि लेने की जिद ने पैरंट्स को परेशान किया हुआ है। यह कहना है सेकंड क्लास में पढ़ने वाली आस्था के पापा जयेंद्र का। वह कहते हैं कि उनके दोनों बच्चे स्कूल से आते ही छोटा भीम देखने बैठ जाते हैं। अगर उन्हें मना करो तो छोटा भीम बनकर फाइटिंग करने लगते हैं। पढ़ाई भी इसी शर्त पर करते हैं कि उन्हें कार्टून देखने दिया जाएगा।

दस साल के ध्रुव को शिन चेन और डोरेमोन इतना पसंद है कि वह उन कैरक्टर्स के बोलने, चलने और काम करने के तरीके को फॉलो करता है। कॉपी, ज्योमेट्री बॉक्स के अलावा कपड़े भी वह किसी न किसी कार्टून कैरक्टर वाले ही पहनता है। कार्टून की तरह तेज-तेज चलना, नोबिता (कार्टून कैरक्टर) की तरह बात-बात पर रोना, छोटे भीम की तरह लड्डुओं और खाने की चीजों को उछालकर खाना उसकी आदत बन चुकी है। हेल्थ पर असर बच्चे भले कार्टून का मजा ले रहे हैं, लेकिन पैरंट्स परेशान हैं। ज्यादा टीवी देखना बच्चों में मोटापा बढ़ने का बेहद अहम कारण बन गया है। इसके अलावा ज्यादा टीवी देखने से बच्चों की आंखें कमजोर हो रही हैं और कम उम्र में ही उन्हें चश्मा लग जाता है। साइकॉलोजिकल प्रॉब्लम्स होना, असामाजिक होना, चिड़चिड़ापन ऐसी बातें हैं जो ज्यादा कार्टून देखने वाले बच्चों में देखने को मिल रही हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे बच्चों का पढ़ाई में मन लगना बंद हो जाता है और उनकी लर्निंग पावर में कमी आने लगती है।क्या कहते हैं एक्सपर्टरॉकलैंड हॉस्पिटल के सीनियर चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. आशीष गुप्ता ने बताया कि वह रोजाना ऐसे पैरंट्स से डील करते हैं जिनके बच्चे कार्टून देखने के आदी हो गए हैं। उन्होंने बताया कि रोजाना दो और महीने में 30 से 50 पैरंट्स उनके पास ऐसी समस्या लेकर आते हैं। गुप्ता कहते हैं, 'जिस तरह की प्रॉब्लम लेकर पैरंट्स आते हैं, उन्हें हम तीन कैटिगरी में रखते हैं पहली- टीवी का अडिक्शन, दूसरी - व्यवहार संबंधी जैसे पढने में मन न लगना और तीसरी कैटिगरी है उग्रता, जैसे छोटे भीम की तरह लड़ाई करना। वर्किंग और होममेकर दोनों ग्रुप के पैरंट्स इस तरह की परेशानी लेकर हमारे पास आते हैं।

वर्किंग पैरंट्स की संख्या थोड़ी ज्यादा होती है क्योंकि ऐसे घरों में बच्चों के लिए टीवी देखना ज्यादा आसान होता है। 2 से 7 साल के बच्चों में कार्टूनों का सीधा असर देखने को मिलता है जैसे चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में मन न लगना, जबकि 7 से 12 साल तक के बच्चे उग्र हो रहे हैं। हमारे पास कई ऐसे पैरंट्स आते हैं जिनके बच्चों की स्कूल से शिकायत आती है कि वे क्लास में बाकी स्टूडेंट्स से मारपीट करते हैं।'वहीं इबहास में सीनियर साइकायट्रिस्ट डॉ. ओमप्रकाश का कहना है कि कार्टून देखने के प्रति बच्चों की दीवानगी से उन पर शारीरिक और मानसिक रूप से असर पड़ता है। बच्चे ज्यादा हिंसक और चिड़चिड़े हो जाते हैं। इसके अलावा उनकी भाषा भी खराब होती है। ज्यादातर कार्टून जापानी लैंग्वेज में बनते हैं और बाद में उनका इंग्लिश और हिंदी में अनुवाद किया जाता है।

जाहिर है, ट्रांसलेशन को नैचरल बनाने के लिए अनाप शनाप चीजें जोड़ी जाती हैं। कार्टून बच्चों के लिए खेल है। इनमें अच्छी और बुरी दोनों ही बातें शामिल होती है, लेकिन बच्चे बुरी बातों को जल्दी पिकअप कर लेते हैं। इसका असर उनके व्यवहार पर पड़ता है। जिम्मेदार डॉक्टरों का मानना है कि बच्चों में कार्टून देखने की आदत पहले खुद पैरंट्स ही डिवेलप करते हैं। जब बच्चे खाना नहीं खाते तो पैरंट्स उनका दिमाग बंटाने के लिए उन्हें कार्टून दिखाते हैं जिससे वे खाना खा लें। घर से बाहर खेलने नहीं जाने देना या घर का कोई काम कराना हो तो पैरंट्स अक्सर खुद ही बच्चों को टीवी में कार्टून चैनल लगाकर बिठा देते हैं। बार-बार ऐसा करने से बच्चों को भी कार्टून देखने की आदत पड़ जाती है। जो बच्चे खाना खाने में परेशान करते हैं, उन्हें पैरंट्स अक्सर यह कहकर खाना खिलाते हैं कि दूध पीने से तुम छोटे भीम की तरह स्ट्रॉन्ग बन जाओगे। इस तरह हम खुद ही बच्चों में कार्टून कैरक्टर्स के प्रति रुचि पैदा करते हैं।

ऐसे करें बच्चों को कंट्रोल
*
बच्चों के टीवी देखने का समय फिक्स करें। रोजाना सिर्फ 1 घंटे के लिए टीवी देखने दें। इसमें से आधा घंटा कार्टून और बाकी आधा घंटा बच्चे अपनी पसंद का कोई और प्रोग्राम देख सकते हैं।
*अचानक उनका टीवी देखने का समय कम न करें। टीवी का समय धीरे-धीरे ही कम करें।
*बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। उन्हें अकेला न रहने दें। इससे टीवी की ओर रनका रुझान कम होगा।
*बच्चों के साथ गेम्स खेलें, उन्हें म्यूजियम दिखाने लेकर जाएं, उनके साथ गप्प मारें।
*बच्चों के भीतर कोई एक ऐसी हॉबी विकसित करें जो उनका पैशन बन जाए यानी उसके सामने बच्चा सब कुछ भूल जाए। मसलन बच्चा कोई इंस्ट्रुमेंट बजाना सीख सकता है, म्यूजिक सीख सकता है, ड्रॉइंग सीख सकता है।
*कोशिश करें बच्चे का खेल के मैदान के साथ रिश्ता कायम रहे। वह दौड़े, भागे, शारीरिक मेहनत करे। ऐसा करने से बच्चों के अंदर हॉर्मोनल बैलेंस बना रहता है और उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता में बढ़ोतरी होती है।
*अगर बच्चे जिद करें तो उनके सामने हथियार न डालें नहीं तो वे वह हर बार जिद करके अपनी बात मनवाने लगेंगे।
---------------

सावधान! बच्चों को भी होती है टेंशन



मुस्कुराते बच्चे किसे अच्छे नहीं लगते। हालांकि आजकल की टेंशन भरी जिंदगी में उन पर भी टेंशन की छाया आ सकती है। 2-3 साल तक के बच्चों से लेकर 16-17 साल की उम्र पार करने तक उन्हें किसी भी वजह से टेंशन हो सकती है। एक्सपर्ट्स की सलाह से टेंशन को समझने और उससे उबरने के तरीके बता रही हैं नेहा जैन :

क्या है टेंशन
कैसे छोटा बच्चा घर में हुई हलचल से टेंशन की खाई में गिर जाता है, इसे छोटी-सी घटना से समझा जा सकता है-

'आठ साल का सार्थक (बदला हुआ नाम) अपने पैरंट्स से बहुत प्यार करता था। एक दिन उसे पता चला कि उसके पापा को कैंसर है और वह कभी भी उसे छोड़कर जा सकते हैं। इस बात से वह अचानक काफी टेंशन में आ गया और बात-बात पर घबराने लगा। उसने खाना-पीना कम कर दिया और स्कूल जाने से कतराने लगा। स्कूल से आते ही पैरंट्स के बारे में पूछता था और दोस्तों के साथ भी खेलने नहीं जाता था। हर वक्त अपनी मां से चिपका रहता और रोने लगता। पहले वह हंसता-खेलता था लेकिन अब उसका सारा फोकस अपने पिता पर आ गया था। हालात बिगड़ते देख उसे साइकायट्रिस्ट के पास ले जाया गया। वहां उसकी और उसके पैरंट्स की काउंसलिंग की गई। तब जाकर उसे हालात से लड़ने की ताकत और हिम्मत मिली।'

टेंशन एक तरह की मानसिक बीमारी है। यह मन की स्थिति और परिस्थिति के बीच असंतुलन और कोऑर्डिनेशन में कमी के कारण होता है और इसका दिलो दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। टेंशन में शरीर बीमार और एनर्जी का लेवल काफी कम लगता है। टेंशन के कारण फिजिकल और मेंटल डिवेलपमेंट में भी रुकावट आती है। अगर दो हफ्ते या उससे ज्यादा लगातार उदासी बनी रहे और किसी भी काम में मन न लगे तो समझना चाहिए कि टेंशन हावी होने लगा है।

बच्चों को कैसा टेंशन
बच्चों में टेंशन भी बड़ों में टेंशन की तरह होता है किन्तु उनके कारण कुछ अलग हो सकते हैं। बच्चों के आसपास अलग-अलग तरह का माहौल होता है जिसका उन पर सही-गलत असर पड़ता है। घर, स्कूल, ट्यूशन, प्ले ग्राउंड आदि कहीं पर भी उनका सामना टेंशन से हो सकता है। इस वक्त उनके जीवन में बदलाव भी काफी तेजी से आते हैं। ऐसे में कब कौन-सी बात टेंशन का सबब बन जाए यह कहना मुश्किल है। लेकिन इससे बच्चे की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है और उसका मन हमेशा उदास रहता है।

क्यों होता है बच्चों को टेंशन
पैरंट्स का बर्ताव
अक्सर बच्चों में अपने भाई-बहनों को अधिक अटेंशन मिलने के कारण टेंशन देखा जाता है। दूसरे भाई-बहन के जन्म के बाद पैरंट्स का अटेंशन नवजात शिशु पर अधिक हो जाता है और पहले बच्चे को मिलने वाला अटेंशन कम हो जाता है। नवजात शिशु के पास जाने के लिए भी उसे कई तरह की हिदायतें दी जाती हैं और जरा-सी लापरवाही पर उसे डांट पिला दी जाती है। इस तरह दूसरे बच्चे को मिलने वाले ज्यादा अटेंशन और प्यार के कारण उसमें हीन भावना आ जाती है। उसका मन उदास रहने लगता है। इसके अलावा भाई-बहन के साथ एक कॉम्पिटिशन भी रहता है। स्कूल में एक के अच्छे परफॉर्मेंस के कारण दूसरे बच्चे को हीन भावना का अहसास कराया जाता है। इस वजह से उसमें टेंशन आ सकता है।

पढ़ाई का बोझ, एग्ज़ाम्स का टेंशन
आज बच्चों के बस्ते पहले के मुकाबले काफी भारी हो गए हैं। उनके सब्जेक्ट्स भी बढ़े हैं और हर महीने क्लास टेस्ट, यूनिट टेस्ट, ट्यूशन टेस्ट आदि का दबाव अलग। किसी एक सब्जेक्ट में अच्छी पकड़ न बनने के कारण वह लगातार उसमें कमजोर होता जाता है। ऐसे में एग्ज़ाम्स के दौरान भी वे टेंशन में रहते हैं। सभी पैरंट्स अपने बच्चे को फर्स्ट पोज़िशन पर देखना चाहते हैं। इस कारण एग्ज़ाम्स के दौरान ज्यादा पढ़ाई और पूरी नींद न ले पाने के कारण टेंशन घेर लेता है।

मानसिक और शारीरिक टॉर्चर
प्रताड़ना शारीरिक हो या मानसिक, वह किसी को भी टेंशन में ले जा सकती है। फिर बच्चों का मन तो बहुत कोमल होता है और वे इससे जूझने में सक्षम नहीं होते। वह ऐसी स्थिति को कंट्रोल भी नहीं कर पाते। ऐसे में वह गुमसुम रहने लगते हैं। बच्चों के साथ स्कूल में या घर में कहीं भी इस तरह की स्थिति हो सकती है। कभी-कभी पैरंट्स ही बच्चों को मारने-पीटने लगते हैं। खुद पर ही नहीं, घर में दूसरों के साथ टॉर्चर का असर भी बच्चों पर पड़ता है जो उसे तनाव में ले जा सकता है।

पैरंट्स का बिजी रहना
बच्चे सबसे अधिक अपने पैरंट्स के करीब होते हैं। पैरंट्स के साथ होने से उनमें कॉन्फ़िडेंस आता है। लेकिन आजकल जब पैरंट्स वर्किंग हैं तो ऐसे में वह अपने बच्चों के साथ वक्त नहीं बिता पाते और बच्चे खुद को अकेला पाकर टेंशन से घिरने लगते हैं।

दोस्तों से लड़ाई
दोस्ती एक खूबसूरत रिश्ता है और बचपन की दोस्ती का तो कहना ही क्या। इसमें दरार पड़ते ही किसी का भी मूड खराब हो सकता है। अक्सर लोग दोस्तों के साथ ही अपनी बातें शेयर करते हैं। बच्चों के लिए भी उनके दोस्त काफी अहम होते हैं। ऐसे में दोस्तों से लड़ाई उन्हें टेंशन में ला सकती है।

घर में टेंशन का माहौल
घर में यदि टेंशन भरा माहौल है तो उसमें बच्चे का टेंशन में आना स्वाभाविक है। आज की बदलती लाइफस्टाइल और तेजी से बढ़ते शहरों में रिश्तों की विश्वसनीयता घटती जा रही है और तलाक के मामले बढ़ते जा रहे हैं। पति-पत्नी के बीच रिलेशन अच्छे न होने से उनके बच्चों पर भी असर पड़ता है और टेंशन बढ़ने लगता है।

पॉकेट मनी का असर
पैसों की परेशानी सिर्फ बड़ों को ही नहीं बल्कि बच्चों को भी टेंशन में डालती है। बच्चे जब स्कूल जाते हैं तो उनके बीच में कुछ अमीर बच्चे होते हैं जिनकी पॉकेट मनी ज्यादा होती है। ऐसे में पैसों की कमी के कारण बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है। वह पैरंट्स से नई चीजें खरीदने के लिए जिद कर सकता है और मना करने पर टेंशन में आ सकता है।

लुक्स को लेकर टेंशन
यह अधिकतर 14 साल से ऊपर के बच्चों में होता है। इस उम्र में बच्चे अपने लुक्स पर ध्यान देने लगते हैं। जो बच्चे लुक्स में ज्यादा आकर्षक नहीं होते या ज्यादा मोटे होते हैं तो वे हीन भावना का शिकार होने लगते हैं। कभी-कभी दूसरे बच्चे भी उनका मजाक बनाते हैं और वे टेंशन के शिकार हो जाते हैं।

गैजट्स पर अधिक वक्त बिताना 
टीवी, कंप्यूटर और मोबाइल जैसे गैजट्स ज्यादातर लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं और बच्चे भी अपना ज्यादा वक्त इन्हीं में देने लगे हैं। इस वजह से उनकी फ़िज़िकल एक्टिविटी में कमी आ गई है। आजकल के बच्चे खेल के मुकाबले इन गैजट्स में ध्यान देने लगे हैं जो उन्हें कहीं न कहीं अकेलेपन की ओर ले जाते हैं।

कैसे पता लगाए बच्चों में टेंशन
पैरंट्स के सामने अक्सर यह परेशानी आती है कि वह बच्चों में टेंशन का पता नहीं लगा पाते। टेंशन का शिकार बच्चा नॉर्मल ही दिखता है किन्तु उसके बर्ताव को बारीकी से देखने पर पता लगाया जा सकता है कि वह टेंशन में है।

आमतौर पर टेंशन के लक्षण कुछ ऐसे होते हैं:
भूख न लगना
पढ़ाई में मन न लगना
गुमसुम रहना
बिना किसी बात के रोना
चिड़चिड़ा हो जाना
अकेले ज्यादा वक्त बिताना और सोचते रहना
बाकियों के साथ बेवजह गुस्से भरा बर्ताव करना
स्कूल से अचानक ज्यादा शिकायतें आना
जिद करना
अगर इनमें से कोई भी लक्षण दिखें तो उन्हें गंभीरता से लें। यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि ये लक्षण किसी और बीमारी के भी हो सकते हैं। इसलिए पैरंट्स को पूरी तरह से जांच करा लेनी चाहिए।

कैसे कम होगा टेंशन
यदि आपका बच्चा टेंशन में है तो इसे फौरन दूर करने के उपाय खोजें। बच्चों में टेंशन की दस्तक सुनते ही इन बातों पर अमल करें:
साथ बिताएं वक्त
पैरंट्स को अपने बच्चों के साथ वक्त बिताना चाहिए। बच्चे अपने पैरंट्स के सबसे ज्यादा करीब होते हैं और उनके साथ कुछ क्वॉलिटी टाइम बिताना चाहते हैं। बच्चों के बड़े होने तक पैरंट्स को उन्हें वक्त देना चाहिए।
चलो दोस्त बन जाएं 
कुछ पैरंट्स बच्चों को छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें डांट देते हैं। उनकी कोई भी बात सुने बिना केवल अपने फैसले थोपते रहते हैं। इससे बच्चों के मन में पैरंट्स के लिए एक डर का भाव पैदा हो जाता है, जिसके कारण वह अपनी बातें कहने से डरने लगता है। पैरंट्स को अपने बच्चों का दोस्त बनना भी जरूरी है ताकि वे अपनी सभी बातों को उनसे शेयर करें। बच्चे के साथ स्कूल में या बाहर कोई भी अनहोनी घटना होती है या ऐसा कुछ होता है जिससे वह टेंशन में आ जाता है तो उसे धैर्य से सुनें और समझने-सुलझाने की कोशिश करें। ऐसे में बच्चों को डांटना घातक साबित हो सकता है।
प्रेशर न डालें
अक्सर पैरंट्स बच्चों को सबसे आगे रखने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसी उम्मीद के चलते वे बार-बार बच्चों को अव्वल आने के लिए कहते रहते हैं जिससे बच्चा टेंशन का शिकार हो जाता है। ऐसे में पैरंट्स को समझना चाहिए कि हर इंसान की अलग-अलग क्षमताएं हैं। पैरंट्स को बच्चों पर एग्ज़ाम्स, खेलों और दूसरी एक्टिविटीज में अव्वल आने के लिए किसी भी तरह का दबाव नहीं डालना चाहिए। उन्हें बच्चों को पार्टिसिपेशन के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। फिर बच्चा हारे या जीते, उन्हें यह विश्वास दिलाना चाहिए कि हर कंडिशन में वह अपने बच्चे के साथ हैं। इससे बच्चे में कॉन्फिडेंस आता है और वह टेंशन फ्री होकर बेहतर प्रदर्शन भी करता है।
करो अपने मन की
बच्चों को फ्रीडम देना भी जरूरी है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें बेवजह कुछ भी करने की छूट दे दी जाए। बच्चों को फ्रीडम देने का मतलब है कि वे अपने करियर में जो भी करना चाहे उसे समझें और सही दिशा देने में मदद करें। इसके अलावा बच्चों को कुछ फैसले लेने का हक देने से वह खुद को महत्वपूर्ण समझने लगते हैं।
मनी मैनेजमेंट
बच्चों को मनी मैनेजमेंट भी सिखाना चाहिए। पैरंट्स को बच्चों की पॉकेट मनी का हिस्सा तय कर देना चाहिए। यह हिस्सा न तो बहुत कम हो न ही बहुत ज्यादा। पॉकेट मनी को सही जगह खर्च करने और सेविंग की सीख भी आप ही उन्हें दे सकते हैं। यदि कोई बच्चा पॉकेट मनी को लेकर अमीर बच्चों के सामने हीनभावना का शिकार होता है तो पैरंट्स को उसे धैर्य के साथ समझाना चाहिए। आप बच्चे की उम्र के हिसाब से पॉकेट मनी तय कर सकते हैं मिसाल के तौर पर पांचवीं क्लास के बच्चों को 10 रुपये रोज तक दिए जा सकते हैं। उससे बड़े बच्चों को 20-30 रुपये। इसी तरह ज़रूरत के हिसाब से इस रकम को कम-ज्यादा किया जा सकता है।
बनाएं खुशहाल माहौल
यदि बच्चा टेंशन में है तो उसके आसपास के माहौल को खुशहाल बनाकर टेंशन को घटाया जा सकता है। सबसे पहले ध्यान रखना चाहिए कि घर में माहौल सौहार्दपूर्ण रहे। यदि तब भी वह टेंशन में है तो पैरंट्स को स्कूल, ट्यूशन और अन्य ऐसी जगहों, जहां बच्चे का रोजमर्रा में जाना होता है, वहां का माहौल देखना चाहिए। यदि कुछ गलत है तो फौरन कार्रवाई करें।
रूटीन में करे बदलाव
बच्चा यदि टेंशन में है तो उसे फौरन उस कंडिशन से बाहर लाने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए। इसके लिए आप उसे किसी डांस क्लास, स्विमिंग आदि जैसी एक्टिविटी में आगे बढ़ा सकते हैं। उसे बाहर घुमाने ले जा सकते हैं। इस तरह से रूटीन में बदलाव करने से उसका ध्यान दूसरी जगहों पर जाएगा और टेंशन में कमी आएगी।
साइकायट्रिस्ट के पास जाएं
अक्सर लोग टेंशन के लिए साइकायट्रिस्ट के पास नहीं जाते क्योंकि वह साइकायट्रिस्ट के पास जाने को पागलपन से जोड़ने लगते हैं। यह गलत धारणा है। साइकायट्रिस्ट से सलाह करना पागलपन नहीं है। यदि टेंशन खत्म न हो तो बच्चे को साइकायट्रिस्ट के पास जरूर ले जाएं। साइकायट्रिस्ट अक्सर काउंसलिंग से ही स्थिति को कंट्रोल कर लेता हैं। यह काउंसलिंग बच्चे के साथ पैरंट्स को भी दी जाती है। इससे बच्चे में तेजी से सुधार आता है।
साइकायट्रिस्ट और साइकॉलजिस्ट में फर्क 
अक्सर लोग साइकायट्री और साइकॉलजिस्ट के बीच कन्फ़्यूज़ हो जाते हैं और समझ नहीं पाते कि टेंशन की कंडिशन में किसके पास जाएं। साइकायट्रिस्ट दवाओं से मानसिक बीमारियों को ठीक करता है जबकि साइकॉलजिस्ट काउंसलिंग, साइको थेरपी, आईक्यू टेस्ट, पर्सनैलिटी टेस्ट आदि टेस्ट करता है। टेंशन की स्थिति में कोगनिटिव बिहेवियर थेरपी से काम चल जाता है। टेंशन होने पर साइकायट्री या साइकॉलजिस्ट किसी के पास भी जाया जा सकता है।
प्रेग्नेंसी में न लें टेंशन
प्रेग्नेंसी के दौरान यदि मां टेंशन में रहती है तो इसका असर पैदा होने वाले बच्चे पर भी पड़ सकता है। टेंशन की शिकार किसी भी महिला को सबसे पहले तो प्रेग्नेंसी में ही समस्या होती है। अगर प्रेग्नेंसी के दौरान भी टेंशन बना हुआ है तो इसका असर बच्चे के विकास पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा पैदा होने के बाद भी उसमें कुछ बीमारियां हो सकती हैं। तनाव का उसके दिल पर बुरा असर पड़ सकता है। इसीलिए प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को टेंशन में नहीं रहना चाहिए। यदि कभी टेंशन की स्थिति आती है तो ऐसे में उन्हें जल्द ही इससे बाहर आने की कोशिश शुरू करनी चाहिए।
योग करेगा टेंशन फ्री
योग इंसान को हेल्थी रखने महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यह इंसान पॉजिटिव सोच वाला बनता है और टेंशन की स्थिति से बचा रहता है। रोज योग के साथ-साथ ध्यान करने से बुद्धि तेज होती है, याद्दाश्त बढ़ती है, कॉन्फिडेंस बढ़ता है और बुरे वक्त में भी बैलेंस बना रहता है। ऐसे में आपको बच्चों को इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। टेंशन में आप उनके साथ योग सीखने के लिए जा सकते हैं और बच्चे के साथ योग कर सकते हैं।

टेंशन फ्री रहने के लिए कुछ वेबसाइट
www.depression-understood.org
forums.psychcentral.com/depression/
www.depressionalliance.org
www.depression-chat-rooms.org

मोबाइल ऐप्स
M3 Screen
myCompass
Mood 24/7
Moody Me
Optimism

कुछ टिप्स बच्चों के लिए
टेंशन में बच्चों को भी कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए और उससे बाहर आने के लिए उपाय खुद करने चाहिए। इन बातों का ध्यान रख बच्चे खुद भी टेंशन को मात दे सकते हैं:-
- टेंशन की स्थिति में किसी से बात करना बहुत जरूरी है। यदि आप भी किसी बात को लेकर परेशान हैं तो उसे अपने पैरंट्स या किसी और से शेयर करना चाहिए।
- गेम्स बच्चों को टेंशन से फौरन बाहर लाते हैं। बच्चों को बाहर जाकर फ़िज़िकल ऐक्टिविटी वाले गेम खेलने चाहिए। यदि आपको स्विमिंग पसंद है तो वह ज़रूर करनी चाहिए। इनडोर गेम्स में चेस, लूडो, कैरम आदि गेम्स टेंशन बस्टर साबित होते हैं।
- टेंशन में टीवी और मोबाइल से दूर रहना चाहिए। यदि आप टीवी देखने के शौकीन हैं तो कॉमिडी वाले प्रोग्राम देखें। ऐसे में क्राइम व सीरियस प्रोग्राम्स से बचना चाहिए।
- अगर पढ़ाई को लेकर टेंशन है तो टाइम टेबल बनाकर इससे निपटा जा सकता है।
- अगर आपकी किसी दोस्त से लड़ाई हो गई है तो आपको खुद उससे बात कर लेनी चाहिए। दोस्ती में सारी गलतियां माफ़ होती हैं।
- रात को जल्दी सोना चाहिए और पूरी नींद लेनी चाहिए।
- तनाव में कैफीन वाले ड्रिंक्स जैसे चाय, कॉफी, कोला आदि लेने से बचना चाहिए।
- यदि टेंशन बढ़ता जा रहा है तो डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए।
-------------